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Monday, July 1, 2013

तितलियाँ

अवसाद के क्षणों में
ढूँढने लगती हूँ,
तितलियों का 'घर '

देखतीं हूँ
रंग-बिरंगी तितलियों को
फूलों संग अंगीकार होते हुए

'फूल' तितलियों के घर नहीं होते
एक ऋतु तक रहतीं हैं ,
तितलियाँ उनके संग

आसमां छत
पंखुरियाँ बिछौना
सुगंधित बयार दीवारें
खेलतीं हैं तितलियाँ

कब सोतीं हैं
कब जागती है
सोचती हुई
रंग तितलियों के
अपने होठों के कोर में
........ ढूंढ लेतीं हूँ

(खुशियों की परिभाषा ढूँढने का प्रयास करते हुए .. बस यूँ ही )
(शोभा)

Thursday, January 6, 2011

मैं एक स्त्री हूँ - स्त्री जीवन के विभिन्न चरण

by Shobha Mishra on Wednesday, January 5, 2011 at 9:52pm














....जन्म....

लो जी मेरा जन्म हुआ..
माहौल कहीं कुछ ग़मगीन हुआ..
किसी ने कहा लक्ष्मी जी आई हैं ...
खुशियों की सौगात साथ लायी हैं !
घर में थी इक बूढी माता ...
तिरछी निगाह करके उन्होंने माँ को डांटा !
माँ की कोख को कोसने लगी ...
मुझे मेरे पिता के सिर का बोझ कहने लगी !

.....बचपन.....

अब कुछ बड़ी हो गयी हूँ ...
कुछ-कुछ बातें अब समझने लगी हूँ..
माँ मुझे धूप में खेलने नहीं देती...
काली हो जाओगी , फिर शादी नहीं होगी ये कहती...
भइया तो दिन भर अकेला घूमता..
मुझे मेरी माँ ने कभी न अकेला छोड़ा...
रहते थे एक सज्जन पड़ोस में...
इक दिन माँ ने मुझे देखा उनकी गोद में...
घर लाकर मुझे इक थप्पड़ लगाया..
बाद में मुझे फिर गले से लगाया...
मेरी नाम आँखों ने माँ से प्रश्न किया..
मेरी आँखों को मेरी माँ ने समझ लिया..
गंदे हैं वो बेटा , मुझसे माँ ने ये कहा..
नहीं समझी मैं उनकी बात..
पर माँ पर था मुझे पूरा विश्वास !

.. युवा वस्था ....

अब मैं यौवन की देहलीज पे हूँ..
अच्छा-बुरा बहुत कुछ जान गयी हूँ..
कुछ अरमान हैं दिल में, मन ही मन कुछ नया करने की सोच रही हूँ...
माँ ने सिखाई कढाई-बुनाई ...
और सिखाया पकवान बनाना ...
तुम तो हो पराया धन तुम्हे है दूजे घर जाना...
करती गयी मैं सब उनके मन की..
दबाती गयी इच्छाएं अपने मन की !

...... विदाई ....

चलो ये भी घडी अब आई ...
होने लगी अब मेरी विदाई ...
बचपन से सुनती आई थी...
जिस 'अपने' घर के बारे में....
चली हूँ आज उस 'अपने' घर में..
सासू जी को मैंने माँ माना ...
ससुर जी को मैंने पिता माना ...
देवर लगा मुझे प्यारा भाई जैसा ..
ननद को मैंने बहन माना ...
पति को मैंने परमेश्वर माना ...
तन-मन-धन सब उन पर वारा !

......मातृत्व .....

सबसे सुखद घड़ी अब आई ....
आँचल में मेरे एक गुड़िया आई ....
फूली नहीं समाई मैं उसे देखकर...
ममता क्या होती है, जान गयी उसे पाकर...
सोये हुए अरमान एक बार फिर जागे .......
संकल्प लिया मन में, जाने दूँगी उसे बहुत आगे ...
सच हुआ मेरा सपना अब तो...
कड़ी है अपने पैरों पर अब वो ....

.... प्रौढ़ावस्था ...

उम्र कुछ ढलने लगी अब तो ...
कुछ अकेलापन भी लगने लगा अब तो ...
आँखें भी कुछ धुंधला गयी हैं ..
झुर्रियां भी कुछ चेहरे पे आ गयी हैं...
जो कभी पास थे मेरे, वो अब दूर होने लगे हैं ...
तनहाइयों में मुझे अकेला वो सब छोड़ने लगे हैं...
हद तो तब हो गयी जब मैंने ये सुना...
जिन के लिए न्योछावर तन-मन किया....
उन्होंने ही मुझसे ये प्रश्न किया ..
की तुमने मेरे लिए क्या है किया...
थक गयी हूँ, हार गयी हूँ मैं अब...
बहुत ही निराश हो गयी हूँ मैं अब...
मुड जो देखती हूँ पीछे ..
मजबूर हो जाती हूँ ये सोचने पर ..
कौन थी मैं?कौन हूँ मैं?क्या है मेरा वजूद?
यही सोच-सोच कर अब इस दुनिया से चली बहुत दूर !

**** शोभा

Sunday, December 19, 2010

**** अनमोल हूँ मैं ****




बहुत खूबसूरत हूँ मैं ...
सुबह की सुनहरी धूप हूँ मैं !


कल- कल करती बलखाती चाल है मेरी ...
सरिता हूँ मैं !


सूरज की रौशनी से चमकता हिमालय जैसे ...
सिंदूरी ,उजला मेरा रूप है ऐसे !


घुमड़- घुमड़ कर जो मेघ बरसते ..
वो काली घटायें हूँ मैं ...


लाल,पीले,नीले जो फूल खिलें हैं ..
उनकी रंगत - ख़ुशबू हूँ मैं !


चाहो अगर तुम खोज लो ...
रत्नों का खजाना हूँ मैं ...


सागर की गहराई में जाओ ...
सीप में छिपी मोती हूँ मैं !


कोयल जैसी कूक है मेरी ..
चिड़ियों जैसी चहक है मेरी ..
कलरव करती कभी इस डाल ..
कभी उस डाल ...
वो पंछी  हूँ मैं !


धरा का आँचल  लहरा रही ...
वो मलय पवन हूँ मैं !


करती हूँ तुम्हे मैं बहुत प्यार ...
तुम भी तो करो मुझे थोडा प्यार ..


आओ मेरे पास,मुझे समझो ,
मुझे सहेजो ...


प्रकृति हूँ मैं ...
प्रकृति हूँ मैं ...

**** शोभा ****

*** कहाँ हो तुम ***

Sunday, December 12, 2010

**** सन्मार्ग ****

खुद पर तू गुमान न कर ए खुदा के बन्दे ...
कर दे खुद को तू उसके हवाले ...

खाक में मिल जायेगा इक दिन तू ...
फिर क्यों ख्वाब हैं तूने इतने पाले ...

जा उसी के दर पे तू ...
देख खड़ा है वो बांह पसारे ...

इक छलावा है मंजिल तेरी ...
काहे उस ओर चला रे ....

कब तक भटकेगा , अब तो थम जा ...
राह तक रहे तेरा ...
उसके बहुतेरे आगोश ...

सारे भ्रमों से ऊपर उठ तू ...
रहे सिर्फ उसी का होश ...

वजह वही है वजूद की सबके ...
वही है सबका खेवनहार ...

कर ले बन्दे तू इस सच्चाई को स्वीकार ....

खुद पर तू ......

!!!! शोभा !!!!

Monday, December 6, 2010

**** बचपन क़ी सहेली ****

आज फिर ख्वाब में वो आई ...
सहेली थी मेरे बचपन की !

वो पलाश के पेड़ो से घिरे ..
मुझे मेरे स्कूल की याद आई !

वो स्कूल का मध्यांतर ...
और वो मस्ती याद आई !

वो सहेलियों संग बैठना ..
वो रूठना मनाना ...

सुन्दर चित्रों से वो ...
पेन्सिल के डिब्बे को सजाना ...

चुपके से बगिया से फूल चुराना ..
फिर वो माली की फटकार याद आई!

आज भी वो सहेली ..
बहुत याद आती है ..
ख्वाबों में मेरे वो अक्सर आती है !

काश तुम मिलती ,साथ बैठते...
बचपन के वो पल...
फिर से हम जी लेते !!

आज फिर ख्वाब ........

!!!! शोभा !!!!

Friday, December 3, 2010

<< बिटिया रानी >>

Monday, November 29, 2010

***** विरह *****

Friday, November 19, 2010

sakhi...