Tuesday, December 6, 2016

मन्नू भंडारी जी पर संस्मरण- शोभा मिश्रा

( साहित्यिक पत्रिका "पाखी" में प्रकाशित संस्मरण )


"हिंदुस्तान के परिवार औरत के कंधों पर टिके हें हैं !" – मन्नू भंडारी
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आदरणीय मन्नू जी से मुझे मिलवाने का सारा श्रेय आदरणीय सुधा (अरोड़ा) दीदी को जाता है !
एक बार सुधा दीदी का फ़ोन आया तो मैं ग्लूकोमा के दर्द की वजह से परेशान थी,आवाज़ सुनकर ही उन्होंने मेरी परेशानी का अंदाज़ा लगा लिया ! दर्द की वजह ग्लूकोमा है ये सुनकर उन्होंने मुझे मन्नू जी से बात करने की सलाह दी और उनका मोबाइल नंबर भी दिया ! मैं संकोच कर रही थी ! मैंने सुधा दीदी से भी कहा कि- " मैं भला कैसे मन्नू जी से बात कर सकती हूँ, वह इतनी वरिष्ठ लेखिका हैं, मुझसे बात करेंगी भला ?"
सुधा दीदी ने एक स्नेह भरी फटकार लगाते हुए कहा - "अरे क्यों नहीं बात करेंगी ? तुम जल्दी से उन्हें फ़ोन करो और उन्हें अपनी बीमारी के बारे में बताओ !"
पहली बार बहुत झिझकते -डरते हुए मैंने मन्नू जी को फ़ोन किया ! उधर से 'हेलो'' सुनकर मैं उत्साह से भर उठी, अपनी प्रिय लेखिका की आवाज़ सुन रही थी, थोड़ी हिचकिचाहट थोड़े संकोच के साथ उन्हें प्रणाम करके मैंने अपना परिचय दिया !
"अच्छा हाँ, सुधा ने तुम्हारे बारे में बताया था ! तुम्हें भी ग्लूकोमा है ?"
ये पहले शब्द थे उनके !.. और उसके बाद उन्होंने अपनी आँखों की बीमारी के बारे में बताया ! ग्लूकोमा होने पर कैसे उन्होंने पहले दिल्ली इलाज करवाया उसके बाद चेन्नई में उनके भाई ने शंकर नेत्रालय में उनका इलाज करवाया ! लगभग आधे घंटे की वो हमारी पहली बातचीत सिर्फ हम दोनों की बीमारी पर ही आधारित थी ! उन्होंने मुझे शंकर नेत्रालय का एड्रेस भी दिया !
मैं बहुत नर्वस थी, उनकी हर बात का जवाब संक्षेप में या ‘जी’ कहकर दे रही थी !
उसके बाद तो उनसे फ़ोन पर कई बार बात हुई ! एक बार मैंने उनसे मिलने की इक्षा जाहिर की,उन्होंने दूसरे दिन ही घर आने के लिए कहा !
अपनी प्रिय व सम्मानित लेखिका से वो पहली मुलाकात आज भी याद है ! करीने से पहनी हुई साड़ी, माथे पर कुमकुम का गोल टीका, चेहरे पर सहज मुस्कराहट के साथ साक्षात् उन्हें देखना किसी सपने जैसा था ! सहजता और सादगी की प्रतिमूर्ति मन्नू जी ने समाज को जो लेखकीय योगदान दिया है, साहित्यजगत में जो उनका स्थान है उस ऊँचाई का आभास तक न होने दिया उन्होंने ! बातचीत की शुरुआत में एक आम घरेलू महिला की तरह घर-गृहस्थी की बातें करतीं रहीं लेकिन बाद में उन्होंने हमारे भारतीय समाज में स्त्रियों की बुरी स्थिति पर खूब चर्चा की ! अपने परिवार में अपनी माँ और नानी-दादी से लेकर आस-पड़ोस की महिलाओं की दयनीय स्थिति पर उन्होंने खूब बात की ! कहानी लेखन के कई बिन्दुओं पर बात हुई ! विश्वास नहीं हो रहा था कि महाभोज, आपका बंटी और यही सच है जैसी कहानियाँ और उपन्यास लिखने वाली वरिष्ठ लेखिका मेरे सामने हैं .. मैं उनसे बात कर रही हूँ .. उन्हें स्पर्श कर सकती हूँ ..! सहज, सरल व्यक्तित्व की धनि मन्नू जी का घर भी उनके व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब है ! किसी भी तरह के उपरी दिखावे से अलग बेहद कलात्मक ढंग से सजे बैठक में हमने लगभग दो घंटे साथ बिताये ! अनमोल में थे वे पल !
"हिंदुस्तान के परिवार औरत के कंधों पर टिके हें हैं !" पहली मुलाकात में कही स्त्रियों के धैर्य को परिभाषित करती उनकी ये पंक्तियाँ आज भी याद हैं !
दूसरी बार उनसे मिलना हुआ सुधा दीदी के दिल्ली आने पर !
मेरे लिए वो दिन बहुत यादगार है जब मैंने उनसे "दूसरी परंपरा" में अपनी पहली प्रकाशित कहानी “नीला आसमान” पढने के लिए कहा !.. और एक दिन उनका फ़ोन आया तो फ़ोन पर ही उन्होंने मुझे मेरी रचनात्मक प्रक्रिया कि अनूठी पहल और साहित्यिक सरोकार के लिए बहुत स्नेह - मान दिया और बधाई दी ! दरअसल मेरे कहने पर उन्होंने पत्रिका का वो अंक पढ़ा जिसमें फरागुदिया का डायरी-अंश प्रकाशित हुआ था ! मेरे माध्यम से डायरी लिख रही बच्चियों को भी फ़ोन पर उन्होंने खूब स्नेह दिया ! अभावग्रस्त, मुख्यधारा से कटी हुई झुग्गी-बस्तियों की लड़कियों को कैसे छोटी-छोटी कार्यशाला के माध्यम से लिखने के लिए उन्हें और ज्यादा प्रेरित किया जाए, माझा जाए, ये भी समझाया ! सच .. उस दिन एक सम्मानित वरिष्ठ लेखिका से अपने काम की तारीफ सुनकर मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ा ! उसके बाद तो उनका स्नेह भरा सानिध्य और मार्गदर्शन लगातार मिल रहा है !
ये जानती हुए भी कि वे साहित्यिक आयोजनों से दूर रहतीं हैं मैंने कई बार उनसे फरगुदिया मंच की गरिमा बढ़ाने का आग्रह किया लेकिन हर बार वे हाथ जोड़कर विनम्रता से मेरा आग्रह ठुकरा देतीं हैं !
राजेंद्र यादव जी उनके संबंधों के बिखराव की वजह कई लेखक मित्रों से और उनके उपन्यास “एक कहानी यह भी” के माध्यम से जान चुकी थी ! .. लेकिन राजेंद्र जी से इतने वैचारिक मतभेद और वैवाहिक संबंधों में बिखराव के बाद भी जब भी मिलने पर मैं उनसे राजेंद्र जी का जिक्र करती तो वे उनके बारे में बहुत ही आदर – सम्मान और प्रेम से उनके बारे में बातें करतीं ! जबकि उनके लिए इतने सम्मान और प्रेम से बातें करते हुए भी उनके प्रति एक गहरी पीड़ा... एक असंतुष्टि का भाव उनके चेहरे पर मैं पढ़ रही थी !
लिखने बैठी हूँ तो मन्नू जी की बहुत सारी बातें लिखने का मन हो रहा है लेकिन सबकुछ लिखना संभव नहीं है !
उनकी स्त्री-प्रधान संवेदनशील कहानियाँ हमारे भारतीय समाज की मध्यमवर्गीय परिवारों की स्त्रियों के संघर्ष की कहानी है जो मौन रहकर चारदीवारी के भीतर घुटती - सिसकती रहती है ! उनका लेखन ऐसी घुटती-सिसकती स्त्रियों के लिए वो खिड़की है, झरोखा है जिससे वे अपने हिस्से का आसमान देख सकतीं हैं ... वो प्रकाश है जिसके माध्यम से वे अपनी स्वतंत्रता की राह अपना सकतीं हैं !
मन्नू जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है ! लिखना-पढ़ना एक लेखक के जीवन का अभिन्न अंग होता है ! ख़राब स्वास्थ्य की वजह से अब लेखन नहीं कर पा रहीं हैं ! बातों – बातों में एक उपन्यास ( जिसकी रूपरेखा तैयार कर चुकीं हैं) और कुछ अधूरी कहानियाँ पूरी करने की अभिलाषा व्यक्त करतीं हैं ! ईश्वर से यहीं प्रार्थना है कि वे स्वस्थ रहें और अपना लेखन जारी रखें !


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शोभा मिश्रा

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