Monday, January 21, 2013

कब जागोगे..?


पोस्टरों, नारों, कविता, कहानियों,
अखबारों ,फेसबुक अपडेट्स
की राजनीती शुरू होती है
 किसी की चीखों के मौन के साथ
कुछ चेहरे, कुछ टोलियाँ
अपनी पहचान बनाने में जुट जातीं हैं

कौन था.. किसने किया ये अपराध ..?
आवाजें उठनी शुरू होतीं हैं

हर दूसरी गली में
होतें हैं सरेआम अपराध
तब सब मौन रहतें हैं
कौन आगे आये
सभी चुप हैं तो हम भी चुप रहें
या दूसरों पर दोष मढें
कोई कुछ करता ही नहीं
तुम अपराध देखकर चुप हो
तो सबसे बड़े दोषी हो
व्यवस्था कृष्ण नहीं हैं
ना ही कानून द्रौपदी के वस्त्र
 कब  जागोगे..?
कब रोकोगे..?
हर उस अपराध को
जो हो रहा है हर रोज
तुम्हारी नज़रों के सामने
बन रही है हर रोज
दामिनी... निर्भया ... फर्गुदिया ......

Friday, December 28, 2012

दामिनी है

रोई नहीं थी
तड़पी नहीं थी
बेबस  नहीं थी

न दर्द
न कराह
वो लड़ रही थी

दुस्साहसियों के साहस
पस्त कर रही थी
चीख नहीं
फ़रियाद नहीं
एक ललकार थी
अब सब जाग जाओ
पुकार थी

देह नहीं
दामिनी है
भीतर कुछ मरा था
वहाँ जिन्दा है
कहीं गयी नहीं
जाने भी मत देना
उसे जिन्दा रखना
सब मिलकर
खुद से एक वादा करना .....

Monday, December 10, 2012

अनुभूति

दिल्ली में अक्सर रोड रेज़ की घटनाओं की खबर देख सुनकर डर सा लगता है लेकिन आज जब मैं ऑटो से घर आ रही थी तो रेड लाइट पर तीन महिलाओं को आपस झगड़ते देखकर बस यूँ ही मुस्कुरा पड़ी, बस के लिए वेट कर रही तीनों महिलाऐं परिधान से उ.प्र के गाँव की लग रहीं थी, दो महिलाऐं बैठी थी , एक महिला खड़ी थी,  जो महिला खड़ी थी वो बैठी हुई महिलाओं की तरफ बार-बार झुक कर अपने दोनों हाथों को सुखोई जहाज़ के कलाबाजियों की तरह घुमा-घुमाकर कुछ कह रही थी, बैठी हुई महिलाऐं भी कभी एक दूसरे की तरफ देखकर अपनी गर्दन कठपुतली की तरह हिला-हिलाकर कुछ कहती , कभी सामने खड़ी महिला की तरफ कुछ यूँ उचककर  आगे बढ़ जातीं जैसे उसे अभी पीट देंगी  .
     इस झगडे में सबसे अच्छी बात मुझे उनका कभी चिड़िया के पंख  की तरह हाथ हिलाना और कभी बौराई गाय की तरह सर झटकना लग रहा था. हमारे उत्तर प्रदेश में जब लड़की का विवाह होता है तब विवाह संपन्न हो जाने के बाद लड़के पक्ष के पुरुष मंडप  का बंधन खोलतें हैं जिसे माड़ो हिलाना भी कहा जाता है, उस समय घर की महिलाऐं गारी (गाली)गातीं हैं, गारी गाते समय उन महिलाओं का हाथ भी बस स्टॉप पर झगड़ती महिलाओं के हाथ की तरह ही नाचता हुआ नज़र आता है.
   जब ट्रैफिक लाइट का सिग्नल ग्रीन हुआ,  ऑटो आगे बढ़ा तो मैंने महसूस किया कि मैं उन्हें देखकर कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रही थी, बगल में मर्सडीज़ कार में बैठे एक सज्जन पर मेरी निगाह गयी , वो मुझे कुछ आश्चर्य भरी नज़रों से देख रहे थे, जिसमें मैं बैठी थी वो ऑटो अपनी रफ़्तार पकड़ चुका था , ऑटो के साइड मिरर से मैंने देखा उन महिलाओं की भी बस आ गयी थी और वे सभी जल्दी-जल्दी उसमें बैठ रहीं थीं ....:) 

Thursday, December 6, 2012

चहक

अदृश्य है
विलुप्त नहीं हुई हैं
बस उड़ गयीं हैं एक मुंडेर से
किसी आँगन के पेड़ से
संकेत बुरे हैं उस मकां के लिए
उस पेड़ के लिए
तिनका-तिनका जोड़कर
जिसमें बनाया था उसने आशियाँ

चहक कहीं गूँज रही है
एक गाँव की हर मुंडेर आबाद है
हर पेड़ पर उनका  चंबा है
उनका अपना आसमाँ
और ऊँची उड़ान है 

Saturday, November 24, 2012

तपती धूप में छाँव

हम कभी-कभी अपनी निजी ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हो जातें हैं कि अपनी माँ को भी फ़ोन करना भूल जातें हैं , आज पूरा दिन   कुछ उलझनों .. दुविधाओं भरा बीता, शाम होते-होते लगा कि जल्दी से मम्मी से बात करूँ, कुछ काम निपटाकर बात करने कि सोच ही रही थी कि तभी मम्मी का ही फ़ोन आ गया, बहुत कुछ आँखों  में छिपाकर  उनसे  बात करती रही और बार-बार उन्हें यही कहती रही कि कुछ दिन के लिए आप मेरे पास आ जाइए, उनसे बात करते हुए यही सोच रही थी कि काश ... अब भी मैं छोटी बच्ची  ही होती ( छोटे बच्चे अपनी माँ से सब भावनाएं व्यक्त कर लेतें हैं, जैसे रोना,जिद करना) .
   मम्मी से बात  करने  के  बाद  फेसबुक लॉगइन किया  तो एक प्यारे दोस्त का प्यारा सा संदेस  देखकर मन खुश हो गया, फिर कुछ देर हम दोनों .... "ओक्का--बोक्का तीन -तडओक्का "
"अटकन-चटकन दही-चटाकन"
"चिउंटी के झगडा छोडाहिया बड़का मामा"
...वाला खेल खेले ..:)
गाँव में जब घर में नया धान  लाया जाता है तो उसे कूटकर  उस चावल के आंटे में दाल की पीठी भरकर  भपारी   देके गाँव एक व्यंजन बनता  है, उसे हमारे गाँव में 'गोझा-पीठा' कहतें हैं , उसके गाँव में चेउआ कहतें हैं ...   हमने उस व्यंजन की बात की.
लिट्टी-चोखा की बात की.
अनाज रखने के लिए मिटटी की बड़ी-बड़ी डेहरी की फोटो देखकर उसके पीछे छिपकर आइस-पाइस खेलना याद आ गया
उस प्यारे दोस्त ने मुझे शहर की घुटन भरे वातावरण में ...गाँव की ताज़ी, खुली हवा की सैर करा दी ...

" तपती धूप में छाँव है
 तुम   हो   तो
 शहर में भी गाँव है "

(शोभा )

Friday, November 16, 2012

इंसान कहाँ था

दिल ने जो महसूस किया
वो .....सच था
आँखों ने जो देखा
वो...... विश्वास था
दिमाग़ ने कुछ समझा
वो थी ....दुविधा

क्या गलत था ..!!!

जो महसूस किया
या .... जो देखा

इस देखने
सोचने
समझने में
इंसान कहाँ था .... !!!
( शोभा )

Monday, November 12, 2012

तेरी वफ़ा



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