Sunday, May 12, 2013

मेरी श्वासें करती रही नित प्रिय का अभिनन्दन - अहा ! ज़िन्दगी

मेरी श्वासें करती रही नित प्रिय का अभिनन्दन                                                                                


एक उन्मुक्त चिड़िया सी चहकती नन्ही बच्ची जब अपनी गुड़िया से खेलती है तभी उसके प्रेम को समर्पित भाव को देखा जा सकता है ... एक पतली शख्त लकड़ी को आधार बना रुई और रिब्बन से उसका उपरी आवरण बनाते समय उसके मन लकड़ी वाले हिस्से को लेकर अपने भीतर धैर्य का निर्माण करती है ... रुई की कोमल पर्त से गुड़िया को आकार देते समय अपने मन की कोमलता का निर्माण कर रही होती है ... रिबन,लाली,बिंदी से सजाते समय अपने अंतर्मन को संस्कारों और रीतिरिवाजों से सजाती रहती है ... मिटटी के सुन्दर छोटे बर्तन और घरौंदें से खेलते -खेलते अपने सपनों का भविष्य सजा रही होती है ... बचपन के इस खेल में ही वो कभी कुछ प्राप्त करने का नहीं सोचती ... गुड्डे-गुड़िया की शादी में गुड्डे को सजे सजाये दुल्हे की भूमिका के बाद अपने सम्पूर्ण अस्तित्व में दुल्हे को अपने श्रृंगार के रूप में देखती है .. सृजनकर्ता और जननी के बीज वो स्वयं ही अपने भीतर तभी बो देती है जब वो स्वयं बिना गोड़ाई की हुई सुखी ठोस मिटटी का भाग होती है...

जेठ की चिलचिलाती धूप .. सावन की बारिश .. कातिक की सर्द रात सी सांसारिक परेशानियों रुपी प्रकृति के प्रकोप को सहती .... अपने आस-पास की उपज को बचाती अन्नपूर्णा का निर्माण करती बिजुका सी गुड़िया बनी पृथ्वी और जीवनदायिनी प्रकृति को बचाए रखने की अनिभूति बालावस्था में ही सहेज लेती है.

" ए री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोए
न मैं जानू आरती वंदन, न पूजा की रीत "

स्त्री के प्रेम और आस्था का उदाहरण है मीरा बाई का प्रेम ... स्त्री प्रेम और आस्था एक दूसरे के पूरक हैं ... बचपन में माँ के कह देने भर से ही उन्होंने कृष्ण को अपना पति मान लिया था .... वहीँ से शुरू हो गयी थी उनकी उपासना और साधना .. विवाह के बाद भी कृष्ण को ही अपना पति माना ... राजसी सुख छोड़कर वन-वन भटकीं अपने प्रेम के लिए ही ... प्रेम में डूबी राधा रानी के प्रेम की कोई थाह नहीं है ... भगवान् श्री कृष्ण राधा के बिना याद नहीं किये जाते ..... सबको मुक्ति मार्ग की राह ले जाने वाले लीलाधर राधा प्रेम में बंधे रहे ....पहला प्रेम ..पहली अनुभूति का उदाहरण है स्त्री प्रेम.

अविवाहित स्त्री के लिए प्रेम एक पवित्र भाव है .. अपने प्रिय से मिलने और उसके स्पर्श की अनुभूति से अलग अपने घर की खिड़की से चुपके से झाँककर अपने प्रिय को निहारना, प्रिय के संदेशों का इंतज़ार करना और संदेस पाकर सकुचाना, अपने प्रिय को न देख पाने और उसकी कोई खबर न मिलने पर व्याकुल होना ही स्त्री प्रेम है.

विवाह को लेकर स्त्री के मुख पर जो महावर और संध्या की नुरानी आभा छिटक जाती है वो सिर्फ प्रिय से मिलन के लिए ही नहीं .. वो सुखद अनिभूति होती है पूर्णता के अहसास की ... एक नयी शुरुवात की .. एक अपना चंबा बनाने की .
विवाह के बाद अपने सारे सपने स्थायी भाव रुपी मोली के मजबूत पवित्र धागे में आम के कोमल पत्ते और गेंदे के फूल से पिरोये वन्दनवार बनाकर अपने घर के दरवाजे पर लटका देती है .... उसका स्थायी प्रेम घर के दोनों तरफ स्वस्तिक चिन्ह , शुभ प्रतीक है.

भारतीय स्त्री में प्रेम के बदले कुछ पाने की उम्मीद रखने के बजाय अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार रहती है...प्रेम में कोई हिसाब-किताब नहीं होता...स्त्री की नज़र में प्रेम का नाम है एक हो जाना... सच्चे प्रेम में अपने साथी से कुछ पाने के बजाय उसे देने की इच्छा अधिक होती ह....ईश्वर ने स्त्री को जन्मजात रूप से भावुक बनाया है आज उसे घर-बाहर की िजम्मेदारियां साथ-साथ निभानी पडती हैं, इस वजह.से उसका व्यक्तित्व बाहर से सख्त प्रतीत होता है जो कि असल में उसका मूल रूप नहीं है...स्त्री प्यार के बदले ढेर सारा प्यार चाहती है ....ईश्वर ने स्त्री को कुछ इस तरह बनाया है कि उसके दिल को समझ पाना बहुत मुश्किल होता है.

स्त्री जब गृहिणी होती है .. दिन भर अथक परिश्रम करके परिवार के सदस्यों की हर जरुरत का ध्यान रखती है ... बदले में वह सिर्फ भाव की भूखी होती है .. एक प्यार भरा स्पर्श .. एक स्नेहिल मुस्कान उसकी हर थकान और पीड़ा हर लेतें हैं ...
स्त्री को सिर्फ भौतिक सुखों की चाह नहीं होती है ...विवाह के बाद कुछ साल तक वस्त्र और गहने स्त्री को आकर्षित जरुर करतें हैं ... लेकिन अंततः वो अपने पति के सामने अपने मन की हर तरह की सुख-दुःख भरी बातों की पोटली खोलकर रख देना चाहती है ... स्त्री के जीवन में विवाह के बाद पति ही सबसे करीबी सदस्य होता है ... अपने पति को वो एक सच्चे मित्र के रूप में देखना चाहती है ... उम्र बढ़ने के साथ माध्यम वर्गीय पुरुषों का प्रेम सिर्फ देह तक सीमित रह जाता है .... वहीँ स्त्री की घुटन का कारण बनती है उसकी अपने मन की दुविधाएं, असमंजसताएँ ... दिनभर की व्यस्ततम दिनचर्या में जब एक घरेलु स्त्री अपने लिए ही समय नहीं निकाल पाती है .. उम्र बढ़ने के साथ उसकी शारीरिक मानसिक पीड़ा उसके शरीर और दिमाग को अकेलापन और दुविधाओं भरे दीमक की तरह खोखला कर देती हैं ..
जिन्हें वो अपने अस्तित्व का मुख्य सूत्रधार समझती है .. उन्ही के विमुख हो जाने से वो निराश, हताश हो जाती है.
ऐसे हताशा और निराशा भरे उसके जीवन में जब कोई ऐसा पुरुष आता है ... जिसके सामने वो अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त कर सकती है ... तो उसके प्रति आकर्षित होना एक स्वाभाविक सी बात है ... स्पर्श रहित भावों से सींचता वो प्रेम उसके दिमाग और शरीर को दीमक द्वारा खोखले किये गए हिस्से के लिए दवा का काम करता है ...
स्त्री के विवाहेतर सम्बन्ध में जरुरी नहीं है की उसमें शारीरिक सम्बन्ध भी शामिल हो ....ऐसे सम्बन्ध में पुरुष के साथ अपने विचारों को खुलकर साझा करना ही उसे बहुत सुख दे जाता है .... पुरुष उसका पति, पिता, भाई, रिश्तेदार, नातेदार कुछ न हो पर वह केवल हमदर्द हो जहां स्त्री मुक्ति की सांस ले... अपने मन की परतों को खोलकर रख सके...

स्त्री प्रेम का बदलता स्वरुप
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सदैव बनी रहने वाली एक शाश्वत भावना है स्त्री प्रेम ...लेकिन समय के साथ स्त्री प्रेम में बदलाव आया है .. बीते समय में चारदीवारी में कैद रहने वाली स्त्री की जरूरतें भी सीमित थी ... वो अपनी सीमित जरूरतों के साथ खुश और संतुष्ट रहा करती थी ... आज बाहर निकलने वाली आधुनिक मध्यमवर्गीय स्त्री की जरूरतें बढ़ने के साथ ही उनकी ज़िन्दगी कशमश भरी हो गयी है ... कामकाजी स्त्री के अनुभवों का दायरा बहुत बढ़ गया है ... पहले स्त्री पति और परिवार को ही अपने जीने का सहारा मानती थी ... इस कारण बहुत सारी बातों को नज़रअंदाज करके हालात से समझौता कर लेती थी ... अपने आत्मसम्मान के प्रति भी जागरूक नहीं थी ... आज की स्त्री अपने आत्मसम्मान के प्रति बहुत जागरूक है .... बदलते परिवेश में थोडा धैर्य से स्त्री मन को समझने की जरुरत है ... आज स्त्री शिक्षित है ... अपने अधिकारों के प्रति जागरूक भी .... आज की स्त्री निर्भीक और जागरूक भी है ...लेकिन आधुनिक होते हुए भी अपने पारिवारिक संबंधों को लेकर बहुत संवेदनशील भी है .... अपने ढंग से संबंधों के बीच सामंजस्य स्थापित रखती है .... पुराने समय में लड़कियों के मन में प्रेम को लेकर दुविधा बनी रही थी ... प्रेम में होती थी लेकिन स्वीकार नहीं करती थीं .. अपराधी न होते हुए भी अपराधबोध से ग्रस्त रहती थी .. अपने प्रेम की बात परिवार के पुरुषवर्ग से छिपाकर रखती थी ... बहुत हिम्मत करती थी तो घर की महिलाओं के सामने अपनी बात हिचकते हुए रखती थीं ... आज लडकियां अपने प्रेम संबंधों को लेकर असमंजस की स्थिति में नहीं रहती ... परिवार के सदस्यों में और दोस्तों में खुलकर अपने प्रेम के बारे में चर्चा करती हैं .. अपने प्रेमी के साथ घूमने भी जाती हैं ...
पुराने समय के मुकाबले आज की स्त्री प्रेम के मामले में व्यवहारिक हो चुकी है .. यह एक तरह से स्वाभाविक भी है .. आज की स्त्री समर्पित प्रेम के साथ-साथ खुद से भी प्रेम करना सीख गयी है .. अपनी इक्षाओं और रुचियों के बारे में सोचती है .... युवा स्त्री हो या प्रौढ़ स्त्री अपने अन्दर छिपे गुणों को निखारकर अपना अस्तित्व निर्माण करना चाहती है .

सांस्कृतिक पहलु और स्त्री प्रेम
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नियतं कुरु कर्म त्व कर्म ज्यायो ह्मकर्मण: |
शरिरयात्रपी च ते न प्रसिद्द येदकर्मणः |
गीता के तीसरे अध्याय के आठवें श्लोक में भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म की व्याख्या कुछ इस तरह से की है कि कर्म एक जगह विशेष आसन पर बैठकर आँखें बंद करके हठ योग करके ईश्वर को याद करने की अपेक्षा सांसारिक कर्म करते-करते भक्ति कर्म करने को श्रेष्ठ बताया है .. कर्म के बिना शारीर को पोषित कर पाना असंभव है ... शारीर को कष्ट में रखकर योग संभव नहीं है .
मानव जीवन कर्म के बिना संभव नहीं है ... कर्म जरुरी है लेकिन मानव जीवन में कर्म कहीं न कहीं संघर्ष की तरह भी है .... कर्म क्षेत्र के संघर्ष में आस्था और धर्म, सांस्कृतिक रीति-रिवाज राहत की भूमिका निभाते हैं .... मानव जीवन कभी रुकने वाला संघर्ष पूर्ण कठिन राह की तरह है .... सांस्कृतिक कार्यक्रम , त्यौहार,व्रत उस कठिन राह में वृक्ष की छाया की तरह है ... जिसमें स्त्री कुछ देर बैठकर सुस्ता लेती है ... पूजा-पाठ प्रवाहित शीतल नदी है ... जो जीवन की जद्दोजहद भरी कंकरीली राह पर चलते-चलते सुख गए कंठ को तृप्त करती है ...
स्त्री की अपने जीवन से जुड़ी जिम्मेदारियाँ भी कुछ कम नहीं है ... कुछ सांसारिक और घरेलु जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते स्त्री का अपना अस्तित्व उसकी नज़रों कहीं खो जाता है ... तीज-त्योहार और धर्म के माध्यम से वो खुद को याद करती है .

"तरसत जियरा हमार नईहर में
अरी बाबा हठ कईले, गवन नाही देहलन
बीती गईले बरखा बहार "
पूर्वी उत्तर प्रदेश में मनाये जाने वाले तीज के त्यौहार में सावन में झूला झूलते हुए एक ब्याहता अपने प्रिय को याद करते हुए मन ही मन बाबा से शिकायत कर रही है.... जिसका गौना अभी नहीं हुआ है .. स्त्री प्रेम के सांस्कृतिक पहलु का खूबसूरत दृश्य है .
सावन में महिलाऐं एक साथ मिलकर कजरी लोकगीत गाते हुए तीज व्रत करती हैं .... अन्य मांगलिक अवसरों पर भी मधुर लोक गीतों का गायन करती हैं .

"कईसे खेले जयिबू सावन में कजरिया
बदरिया घेरी आईल ननदी
घाटा घेरले बा घनघोर, बिजली चमके चारु ओर
ननदी रिमझिम बरसला बदरिया, बदरिया घेरी ...
संगे साथ न सहेली, कईसे जईबू तू अकेली
बीचे गुंडा लोग रोकिहें डगरिया, बदरिया घेरी ..
कतिना गुनडन के मखईबू , कतिना के जेल भिजवईबू
कतिना पीसत होइहे जेल में चकरिया, बदरिया घेरी ..!"

इस भोजपुरी कजरी तीज में भाभी अपनी ननद से हंसी - ठिठोली करती हुई उसे बारिश में बाहर जाने से रोक रही है .
अलग - अलग प्रदेशों में विशेष आयोजनों पर गाये जाने वाले लोक गीत अधिकतर महिलाऐं ही गाती हैं ... पूर्वी उत्तर प्रदेश में बदलते मौसम का स्वागत आत्मीय भाव से स्त्रीयां लोक गीतों के माध्यम से करती हैं ... जैसे फागुन में फगुआ, चैत में चैता, और सावन में कजरी गीत गाकर करती हैं . छठ, तीज,जिउतिया, पीड़िया , चौथ आदि पर गाये जाने वाले पारंपरिक लोक गीतों में स्त्री प्रेम का अद्भुत रूप देखने को मिलता है ...


पति और परिवार के प्रति प्रेम प्रदर्शन करने का माध्यम है तीज-त्योहार. .. स्त्रियाँ को ये रीति- रिवाज निभाने में आत्मिक सुख मिलता है . .. त्योहार व्रत तन-मन की शुद्धि का जरिया भी होतें हैं .. हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत ही बुद्धिमानी से हमारे लिए धर्म के माध्यम से जीवन शैली का हिस्सा बनाया है
आपसी रिश्तों को जोड़ने का माध्यम है त्योहार और पर्व ...स्त्रियाँ त्योहार और रीति-रिवाजों के माध्यम से रिश्तों में मधुरता बनाये रखने का काम बखूबी कर रहीं हैं .... हमारी सांसकृतिक धरोहर को सहेजने का काम भारतीय स्त्रियाँ कर रहीं हैं .

(शोभा )

'अहा ! ज़िन्दगी ' में प्रकाशित आलेख











रानी बनी भिक्षुणी                                                                                                                      





एक निर्धन,एक रोगी और जीवन का कटु सत्य साक्षात् मृत्यु देखने के बाद सिद्धार्थ को जीवन से विरक्ति हो गयी, पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को निद्रा में छोड़ आत्मज्ञान के लिए गृह त्याग कर दिया, पत्नी और पुत्र से अगाध प्रेम होते हुए भी सिद्धार्थ ने उनका त्याग किया, मन में कई प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है , प्राणी मात्र से प्रेम करने की भावना रखने वाले सिद्धार्थ को घर त्यागते समय अपनी प्राण प्रिय पत्नी और सुकोमल नन्हें पुत्र राहुल से क्या स्नेह नहीं रहा होगा ..? लेकिन अगर दूसरे पक्ष की ओर ध्यान दें तो घर-गृहस्थी और राज-पाट में बंधे सिद्धार्थ का प्रेम एक सीमा में बंधकर रह जाता , सिद्धार्थ के आत्मज्ञान के पश्चात् पूरे भारत वर्ष और विश्व में उनके जिन अनमोल वचनों और उपदेश से जन -समूह को जो ज्ञान प्राप्त हुआ हुआ उससे समाज वंचित रह जाता , सिद्धार्थ के महाभिनिष्क्रमण की कहानी में यशोधरा का तप और त्याग है, प्रातः काल पति को घर में न पाकर निश्चित रूप से यशोधरा को जो अपार दुःख हुआ होगा उसकी केवल कल्पना की जा सकती है |


"सखि, वे मुझसे कहकर जाते
कह, तो क्या मुझको वे अपनी
पथ-बाधा ही पाते ?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?"


मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपनी कविता के माध्यम से यशोधरा की व्यथा को उजागर किया है , इसे व्यथा कहना उचित न होगा , ये तो उनकी अपने प्रिय से विरह वेदना है , उलाहना है , प्रतिरोध कहीं भी नहीं है , यशोधरा को मलाल ये है कि सिद्धार्थ अगर उन्हें अपनी अर्धांग्नी मानते तो उनसे छिप कर न जाते जाते , वो उनके अध्यात्म और आत्मज्ञान ग्रहण करने का स्वागत करतीं , उन्हें आदरपूर्वक विदा करतीं |


यशोधरा ने स्वयंबर में असंख्य तरुणों में से सिद्धार्थ को ही वर रूप में चुना था, पिता दंडपाणी जानते थे कि सिद्धार्थ को साधू -संतों की संगत प्रिय है , एकांत प्रिय है , उन्हेंयशोधरा का निर्णय स्वीकार नहीं था , दोनों का दांपत्य जीवन सुखी होगा होगा इस बात पर दंडपाणी को संदेह था लेकिन यशोधरा अपने निर्णय पर अटल रहीं |


सिद्धार्थ भी यशोधरा के लिए लक्ष्यभेद प्रतियोगिता में शामिल हुए और सफल भी हुए ,यशोधरा को अपनी जीवन संगिनी के रूप में पाकर आनंदित भी हुए , यशोधरा की मधुर आवाज़, उनकी धीमी हँसी, उनके गहनों की मीठी रुनझुन सिद्धार्थ को सुखद लगती थी |


राहुल के पैदा होने के बाद वो पुत्र मोह में भी थे, अपनी मासी से ये सुनकर बहुत खुश होते थे कि वो भी बचपन में राहुल के जैसे दिखते थे |


लेकिन एक समय ऐसा आया जब सिद्धार्थ ने विश्व -कल्याण का निर्णय लिया , सत्य को तलाशना चाहा , इसके लिए उन्होंने सांसारिक -सुख और भौतिक सुख-शांति का परित्याग करने का निर्णय लिया , उनकी आत्मा विश्व कल्याण के नूतन आनंद के लिए तड़प रही थी, वे विश्व के रहस्यमय संगीत से अपने हृदय को सराबोर कर देना चाहते थे, वे किसी सीमा में बंधकर नहीं रहना चाहते थे, जीवन में निरंतर गति के लिए उन्होंने आत्मदान कर दिया |


सिद्धार्थ को यशोधरा पर विश्वास था कि उनकी अनुपस्थिति में वो पुत्र राहुल और घर -गृहस्थी को संभाल लेगी, और हुआ भी ऐसा ही , यशोधरा को सिद्धार्थ के जाने का दुःख कम नहीं था , उन्होंने उनके विरह और याद में आंसू बहाते हुए पूरे बारह वर्ष गुजार दिए ,लेकिन पुत्र राहुल के पालन-पोषण में कोई कमीं नहीं रखी, उन्हें लोरी गाकर सुलाती, कभी -कभी अबोध राहुल जब माता यशोधरा से पिता के बारे में पूछते तो वो उन्हें दुलार कर समझाती कि वो सत्य की खोज में गएँ हैं , कभी - कभी जब यशोधरा के मन में सिद्धार्थ के लिए असह्य विरह वेदना उठती तो वे क्षुब्ध होकर राहुल के प्रश्नों के उत्तर कुछ इस तरह देती कि - " पुत्र ! जो अपने आपको छोटा समझतें हैं .. जिनके मन में अपनी सत्ता के अस्तित्व के बारे में लघुत्व और हीनत्व बस जाता है ..वे महान की तृष्णा में निकल पडतें हैं .." | पति के विरह में पत्नी की ये पीड़ा स्वाभाविक थी |


सिद्धार्थ के जाने के बाद यशोधरा ने राजमहल में रहकर भी उन्ही की तरह सन्यासी जीवन व्यतीत किया , यशोधरा के पीहर से बार- बार निमंत्रण आया लेकिन यशोधरा नहीं गयी और राजमहल में ही रहकर सिद्धार्थ की बाट जोहती रही |

पति को सन्मुख पाकर पत्नी की स्वाभाविक पीड़ा
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वटवृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुए और वे बोधिसत्व कहलाये , पूरी दुनिया में उनका नाम हुआ , बारह वर्ष उपरांत जब वे कपिलवस्तु लौटे तो उन्हें सामने देखकरयशोधरा के मन में प्रेम का जो सोता दबा हुआ था वो उलाहना और क्रोध बनकर फूट पड़ा ..


स्वागत, स्वागत, हे आर्यपुत्र !
वंदन तेरा! अभिनन्दन तेरा!!
कैसे करूँ मैं तेरी आरती?
रह गयी कहाँ पूजा की थाली?
पधारो ! पधारो ! हे भगवान् !
सबरी की कुटिया के श्रीराम.
मैंने त्याग दिया है वैभव सारा,
हुआ जब से ओझल राम हमारा.


वो रोती रहीं और शिकायतें करती रही, यशोधरा को सिद्धार्थ के घर त्यागने से ज्यादा इस बात का दुःख था कि उन्होंने एक पत्नी होने के नाते उनपर विश्वास नहीं किया और बिना बताये घर छोड़कर चले गए , सिद्धार्थ के सत्य कि खोज में वो बाधक कभी नहीं बनती , वो क्षत्राणी थी , युद्ध के लिए विदा करते समय टीका और तिलक करके भेज सकती थी तो सत्य की खोज के मार्ग में बाधक कैसे बन सकती थी , यशोधरा ने क्षोभ और क्रोध में बहुत सिद्धार्थ से बहुत सवाल किये किन्तु उनके सभी सवाल पर सिद्धार्थ चुप ही रहे, क्रोधित यशोद्धरा ने उनसे ये भी प्रश्न किया कि "जो ज्ञान उन्हें जंगल में जाकर मिला क्या वो यहाँ राजमहल में रहकर प्राप्त नहीं होता .."
सिद्धार्थ उनके प्रश्नों का क्या जवाब देते बस आँखें झुकाकर उनके सभी प्रश्न सुनते रहे, जब उन्होंने यशोधरा के सामने अपना भिक्षा पात्र बढाया तब यशोधरा ने पुत्र राहुल को उनके समक्ष कर दिया और स्वयं भी उनका अनुसरण करते हुए भिक्षुणी बन गयीं |


शोभा मिश्रा





Friday, April 5, 2013

कुछ यादें

"अपना मोबाईल ऑफ करके क्यों नहीं सोते ??? कभी भी कोई तुम्हें कॉल कैसे कर लेता ?? टाइम देखा तुमने अभी सुबह के पांच बजे हैं ??" सुबह सुबह मोबाइल की घंटी की आवाज़ सुनकर उसने गुस्से में एक साथ कई सवाल कर दिए उससे ... वो नंबर देखकर घबरा गया .. कुछ सचेत होकर बोला "अरे मेरी माँ चुप हो जाओ पैंथर 1 की कॉल है "
उसकी आवाज़ धीमी हो गयी लेकिन वो लगातार बड़बड़ाती हुई उठकर किचेन में काम करने चली गयी " घर के लिए जनाब के पास कभी टाइम नहीं है और अगर कभी मिले भी तो लगातार मोबाइल पर ऑफिस, पैंथर 1 ,2 ,3 , प्रेस रिलीज़, कौन सी मेल आई ...कौन सी भेजी .. बस यही सब !!!! "
"मेरे बच्चे नौकरी ही ऐसी है क्या करूँ ? " कॉल रिसीव करने के बाद ये कहते हुए वो तकिये को बाहों में भींचकर फिर सो गया ... सात बजते ही उसने फिर फटकारने वाले अंदाज़ में उसे जगाते हुए कहा "बच्चों को स्कूल छोड़ने नहीं जाना क्या ??"
वो जल्दी से उठा .. सीधे बाथरूम में गया .. आँखों पर पानी के छींटे मारे और गाडी की चाभी उठाकर कुछ गुनगुनाता हुआ बच्चों को स्कूल छोड़ने चला गया ..
बच्चों को स्कूल छोड़कर वापस आया तो उसे न जाने क्या हुआ .... इस बार वो गुस्से में था ... "गुड्डू की डायरी घर में ही छूट गयी ... तुम करती क्या हो यार ?? तुमने डायरी साइन करके उसके बैग में क्यों नहीं रख दिया ? वो दूध भी पूरा पीकर नहीं गया है !! "
"अरे तो इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो ? ऑफिस जाते समय उसकी डायरी देते हुए चले जाना ... और पूरा दूध नहीं पीकर गया तो इसके लिए मैं क्या करूँ ? क्या क्या ध्यान रखूं ? "
इस बार दोनों ही थोड़े तनाव में थे ... दस मिनट तक यूँ ही दोनों एक दूसरे को कुछ न कुछ उलाहने देते रहे .. वो घर के काम करती रही .... वो टी. वी देखने लगा ... चैनल बदलते हुए 9x चैनल पर एक पुरानी फिल्म का गीत देखकर रुक गया .... लव -इन टोकियो फिल्म का गीत था ... ' ओ मेरे साहे खुबां ... ओ मेरी जाने जाना ना ... तुम मेरे पास होते हो ..'
गीत सुनते ही उसे ना जाने क्या हुआ ... किचेन में गया और उसके सामने जाकर घुटनों के बल बैठकर .. दोनों बाहें फैलाकर.. मुस्कराता हुआ वही गीत गुनगुनाने लगा ..
' ओ मेरे साहे खुबां ... ओ मेरी जाने जाना ना ... तुम मेरे पास होते हो ..'
वो गुस्से में दिखने का असफल प्रयास करती रही ..... वो लगातार गीत गुनगुनाता रहा ... आखिरकार उसके होठों पर मुस्कराहट आ ही गयी ..... मन ही मन खीज भी रही थी .. कि क्यों इतनी जल्दी उसे हँसी आ गयी .. थोड़ी देर और नाराज़ रहती ... कितनी चुभती हुई बातें कही है उसने ..
वो तिरछी निगाहों से उसे देखता हुआ .. गुनगुनाता हुआ .. सेविंग करता रहा .. और वो मुस्कराती हुई उसके लिए ब्रेकफास्ट तैयार करने लगी ..

कुछ यादें ~~ क्रमशः जारी

Tuesday, April 2, 2013

माँ

क्या हुआ ..?
हिचकियाँ तो आयीं नहीं होंगी
शायद भीग गया होगा आंचल
तभी तो
कलप उठा तुम्हारा मन
चौंक कर जाग गयीं
पुकारने लगी मुझे

अब हथेलियों को रोको मत
यहाँ कुछ भी सूखेगा नहीं
बरस रहा है लगातार
मेरे गालों से होकर
तुम्हारे हृदय तक पहुँच गया

अपनी नाभि की लतर से फिर जोड़ लो
भूख, प्यास, उजाले  से अनजान
शायद जीवित भी नहीं हूँ
फिर जीवन दो
आहार दो
अँधेरे में सांस लेने दो ............. 

Sunday, March 31, 2013

कुछ ऐसा हो जाए



काश !

कुछ ऐसा हो जाए

सब कुछ भूल जाऊं

कौन हूँ ...

क्या हूँ ...

क्या करना है ..

किसी को स्कूल भेजना है ..

किसी को ऑफिस भेजना है ..




कोई मेरा है ..

मैं किसी की हूँ .. !




काश !

कुछ ऐसा हो जाए ..

खो जाऊं कश्मीर के जंगलों में

बेताब वैली की वादियों में

पहलगाम में 'बशीर' के घर जाऊं

उसकी पत्नी से खूब बातें करूँ

उसके बच्चों के साथ खेलूं !




काश !

कुछ ऐसा हो जाए

फिर बचपन में चली जाऊं

मामाजी के गाँव में रहने लगूं

सुबह अपनी गाय को चरने भेजूं

शाम को छत से उसका इंतज़ार करूँ

उसके 'बछड़े' को अपने हाथों से घास खिलाउं

'केमुआ' से घोसले से तोता उतारने को कहूँ

तोते की चोंच में चम्मच से दूध पिलाउं !




काश !

कुछ ऐसा हो जाए

नन्ही-मुन्नी गुड़िया बन जाऊं

चांदनी रात में छत पर ...

नानी जी की गोद में सर रखकर सोउं

'रामबिरिक्ष ' की कहानियाँ सुनूँ

"चंदा मामा आरे आवा .. पारे आवा ...

नदिया किनारे आवा ..

चाँदी की कटोरिया में दूध-भात लेले आवा "

नानीजी की लोरी सुनूँ !




काश !

कुछ ऐसा हो जाए

कि 'बेबी' की झोपडी में ..

बेफिक्र होकर उससे मिलने जा सकूँ

उसके चूल्हे पर खाना बना सकूँ

मिटटी के फर्श पर उसके साथ सोकर ...

उसकी डायरी पढ़ सकूँ ........




काश ...... काश ...... काश .....




( 'केमुआ' से बचपन की यादें जुड़ी हैं ..'.रामबिरिक्ष' बचपन की कहानियाँ ..... 'बशीर' बहुत प्यारा दोस्त ..हर सर्दियों में शाल बेचने आता है .... 'बेबी' दिल के बहुत करीब .. प्यारी बच्ची ... )

कविता नहीं है ... बस मन के भाव हैं .... बस एवीं ... बिजी संडे के दिन मन बहलाने के लिए ..:)

Sunday, March 17, 2013

स्त्री-जीवन पर लिखी कविता







एक बेबस

भूखी

गरीब

अपमानित

सिसकते

अक्षरों वाली

स्त्री-जीवन पर लिखी कविता

महफ़िलों की रौनक

तालियों की गूँज से आनंदित

पुरस्कारों से सम्मानित

अपने आलीशान महल में

आराम फरमाती रही !


वास्तविक जीवन में

एक वैसी ही स्त्री

आंसू बहाती

महफ़िलों की रौनक वाली

कविताओं के बीच

अकेली भटकती रही ..

Saturday, March 9, 2013

नर्म रंगत ओढ़े पलाश

कृतिम रंग, स्तब्ध इमारतें
हकीक़त की नर्म रंगत ओढ़े पलाश
गहरी परत ओढ़े चेहरे
मस्तिष्क की शिराएँ,
यांत्रिक संकेतों पर भागती
एक मौसम सी है ज़िन्दगी
हकीकत के रंग ओढ़ ,
क्यों नहीं ठहर जाती ....!!!