Monday, October 7, 2013

पलाश के वृक्ष

एक बार फिर नदी की सतह सूखने ही वाली थी ... नमी की आस कोसो दूर थी ... नन्हे और विशाल मर्यादाओं के पत्थर सतह रुपी हृदय पर ना जाने कब से उसके भार को सह रहे थे .. तभी उम्मीद के विपरीत कौन से शिखर से एक सोता फूटा .. एक नयी नदी शिखर के उषा से नहाये ओजस ललाट से होकर प्रणय का एक नया सफ़र शुरू करके उसके हृदय रुपी सागर में विलीन हो जाना चाहती है ... मर्यादाओं के भारी पत्थर फूलों की तरह हलके लग रहें हैं ... प्रेम की नदी उफान पर है .. बाँध सहमें हुएं हैं !!!!
स्त्री भी तो नदी ही है ना प्रिय ! कितनी ही बार सूखती है लेकिन प्रकृति का ही एक रूप है शिखर .. हर बार ना जाने कहाँ से ले आता है नदी ...
इन संकेतों को समझो प्रिय ... मौसम के विपरीत गुलमोहर और पलाश के वृक्ष फूलों से ढंके हुए प्रतीत हो रहें हैं ... एक सूखे वृक्ष पर चिड़ियों का जोड़ा चहचहा रहा है .....
शोभा

2 comments:

  1. आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........

    एक बार फिर नदी की सतह सूखने ही वाली थी ...
    नमी की आस कोसो दूर थी ...
    नन्हे और विशाल मर्यादाओं के पत्थर
    सतह रुपी हृदय पर ना जाने कब से उसके भार को सह रहे थे ..

    बुधवार 09/10/2013 को
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
    को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

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  2. भावो का सुन्दर समायोजन......

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