Tuesday, December 6, 2011

"नियति" का चक्र



कभी सिहरती
कभी महकती
कभी तपती

कभी भीगती

स्वतः यूँही घूमती हुई
आनंदित हूँ

विचलित नहीं हूँ
जानती हूँ
नीयत नहीं ये तुम्हारी
नियति के चक्र में तुम बंधे हो
और तुम्हारे चक्र में "मैं " बंधी हूँ .....

*** शोभा ***

12 comments:

  1. भावों से नाजुक शब्‍द....

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  2. कल 13/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. "आनंदित" हूँ"विचलित" नहीं हूँ

    आपकी यह प्रस्तुति नई पुरानी हलचल की शोभा बनी,
    यह जानकर बहुत खुशी हुई,शोभा जी.

    सुन्दर भाव मन को भावविभोर कर रहें हैं.

    अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

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  4. वो बंधन खूबसूरत है जिसे दिल ने प्यार से स्वीकार किया है

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  5. बहुत कुछ समेट दिया आपने छोटी सी रचना में , बहुत खूब शोभा जी

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  6. वाह सच में खूबसूरत पेशकश

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  7. aap sabhi ka bahut bahut dhanywad !!

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