Monday, April 25, 2011

छोटी सी ख्वाहिश




1-
 बस एक छोटी सी ख्वाहिश है, मेरी हथेली में चाँद हो ...
और जी भरकर मैं उसका दीदार करूँ .... :):):):)

2-
तो क्या हुआ अगर खंडित मूरत हैं तुम्हारी यादें ... ? मन के मंदिर में न सही स्मृतियों की नदी में निरंतर प्रवाहित हो रहीं हैं ....


3-
माँ की और तुम्हारी दुआएँ एक जैसी हैं ... उदासी के आने से पहले माथे पर नर्म, सुर्ख मुस्कराहट रख जातीं हैं ...
4-
सूखे रंग
जो दिखे
दूर ...................
बहुत दूर होते गए !

पलकें बंद हुई
भीगे रंग
जो नहीं दिखे
.................... पास
बहुत पास आते गए ...

5- 
एक बेबस
भूखी
गरीब
अपमानित
सिसकते अक्षरों वाली
स्त्री-जीवन पर लिखी कविता
महफ़िलों की रौनक
तालियों की गूँज से आनंदित
पुरस्कारों से सम्मानित
अपने आलीशान महल में
आराम फरमाती रही !

वास्तविक जीवन में
एक वैसी ही स्त्री
आंसू बहाती
महफ़िलों की रौनक वाली
कविताओं के बीच
अकेली भटकती रही .........

2 comments:

  1. सार्थक और भावप्रवण रचना।

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  2. धन्यवाद संजय जी !

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