Monday, May 13, 2013

मानसिकता बदलनी चाहिए - आलेख




मानसिकता बदलनी चाहिए
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16 दिसंबर की घटना के बाद पूरे देश में अपराधियों को सजा दिलाने की मांग की जा रही है, ये वाजिब भी है, अखबारों और न्यूज़ चैनल्स पर हर दूसरे दिन बलात्कार की घटनाएं देखने सुनने को मिल जातीं हैं, फेसबुक और अन्य दूसरी सोशल नेटवर्किंग साईट्स के माध्यम से इस पाशविक घटना का पुरजोर विरोध हो रहा है, इस घृणित कृत्य से सभी आहत है, जनता आक्रोशित है, वहीँ कुछ लोग इस घटना से डरे हुए भी हैं।


सबसे ज्यादा डर ग्रामीण इलाकों से उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आई लड़कियों के परिवार वालों को है, वो दिल्ली में अकेली रहतीं हैं, कॉलेज या जॉब से देर रात घर लौटतीं हैं, वे सकुशल घर पहुँचे, इसकी जिम्मेदारी सरकार की है कुत्सित मानसिकता से त्रस्त युवक जिनके लिए महिलाएं जिनके लिए महिलाएं मात्र भोग का साधन है से वे अपनी बेटियों को कैसे बचाएं?


देश में एक प्रबल मांग उठ रही है कि बलात्कार के दोषी व्यक्तियों को मृत्यदंड जैसी कठोर सजा दी जाए, समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो चाहता है कि ऐसे पुरुषों को नपुंसक कर देना चाहिए ताकि वह अपने कृत्य की सजा ज़िदगी भर भुगते। तो क्या कुत्सित और मानसिक रूप से विक्षिप व्यक्ति से लडकियां/महिलाएं अपना बचाव कर सकती हैं ..?


एक पुरुष से एक महिला या लड़की अपना बचाव एक बार कर भी सकती है लेकिन दिल्ली जैसी वीभत्स घटना जिसे एक से ज्यादा लड़कों ने अंजाम दिया ... ऐसी स्थिति में लड़की या महिला चाहकर भी कुछ भी नहीं कर सकती.


अब प्रश्न ये है कि विकल्प क्या हो ----? क्या महिलाओं को घर से निकलना बंद कर देना चाहिए या घर से बाहर निकलकर किसी ऐसी परिस्थिति का सामना होने पर दृढतापूर्वक उसका सामना करना चाहिए।

मनोचिकित्सक डॉ नीलेश तिवारी बलात्कारी की मानसिक स्थिति के बारे में बताते हुए कहतें है कि बलात्कारी कहीं न कहीं किसी हीनभावना का शिकार रहता है, आर्थिक तंगी या किसी अन्य कारन से समाज द्वारा स्वयं को अपेक्षित समझता है.
बलात्कारी अपने आपको प्रूव करने के लिए भी रेप जैसे घृणित कृत्य करतें हैं.
रेप जैसे अपराध को रोकने के लिए समाज कि भूमिका की तरफ ध्यान आकर्षित करते हुए डॉ निलेश कहतें हैं की समाज को महिलाओं और लड़कियों को सम्मान की नज़र से देखना होगा.
महानगरों की फ़ास्ट लाइफ में लोग एक दूसरे से दूर हो रहें हैं , शहरों की अपेक्षा गाँव में रेप कम होतें हैं .


कुछ लोग संस्कारों की बात कर रहे हैं। ऐसे में सबसे पहला ख्याल परिवार का आता है, वास्तव में बेटी- बेटे के भेदभाव को ख़त्म करने की शुरुवात परिवार से ही हो सकती है, अगर गौर किया जाए तो लड़की के जन्म के समय परिवार के सदस्य बस ये सुझाव देते नज़र आयेंगें कि इसे भी बेटे की तरह खूब पढ़ाना ....अपने पैरों पर खड़ा करवाना ... जैसी नसीहतें लड़कियों के प्रति पुरुषवादी सोच का ही उदाहरण हैं।


बेटियोंको उच्च शिक्षा जरुर दी जाती है लेकिन साथ ही साथ घर-गृहस्थी के काम सीखने कि भी नसीहतें दी जातीं हैं, ये कहकर कि ये सब तुम्हें ही करना है जबकि बेटे को सिर्फ उसकी शिक्षा पर ध्यान देने और भविष्य संवारने की नसीहतें दी जातीं हैं।


बेटी थोड़ी बड़ी होती है तो स्कूल या कॉलेज से समय से लौटने कि हिदायतें कभी प्यार से कभी डांटकर उसे ही दी जाती है, लड़कियों के देर रात बाहर रहने के बुरे परिणाम और लड़कों के देर रात बाहर रहने के बुरे परिणाम में भिन्नता भी अनजाने में लड़कियों को उनकी स्त्री अस्मिता की रक्षा का आभास दिलाना ही है. रोजमर्रा के घरेलू काम भी बेटी और बेटे के लिए विभाजित होतें हैं, घर के पुरुषों के कपड़े लड़कियां धोती हैं लेकिन अक्सर परिवारों में लड़कों को ऐसा करने के लिए नहीं कहा जाता , वो कपडे धोते भी हैं तो सिर्फ अपने, अनजाने में ही सही कहीं न कहीं ये संस्कारों का ही परिणाम है कि वो घर की महिलाओं के वस्त्र धोने में शर्म महसूस करतें हैं, लड़कियों को बर्तन धोने, सफाई करने जैसे घरेलू काम करने के लिए कहा जाता है, जबकि लड़कों को बाहर के काम जैसे- सब्जी लाना, राशन लाना जैसे काम सौपें जातें हैं, हर समय बेटी को ये ध्यान दिलाया जाता है कि तुम्हें किसी और के घर जाना है जबकि बेटे को ये भी नहीं सिखाया जाता कि तुम्हारे घर भी तुम्हारी पत्नी के रूप में कोई लड़की आयेगी, उससे तुम्हें कैसा व्यवहार करना है।


कहने का तात्पर्य ये है कि बचपन से लेकर शादी होने तक परिवार में बेटी को अलग और बेटे को अलग संस्कार दिए जातें हैं, जो कि पुरुषप्रधान सोच को बढ़ावा देती है. अभिवावक का व्यवहार: बेटी हो या बेटा वो अपने माता-पिता के व्यवहार से ही सीखता है,
पितृसत्तात्मकसोच वाले अभिवावक अनजाने में अपने आचरण से बहुत कुछ अपने बच्चों को सीख देतें हैं, पिता द्वारा माँ पर हर समय अपना प्रभुत्व जताना, छोटी-छोटी बात पर अपमानित करने का असर बेटे पर गलत पड़ता है, आगे चलकर वो भी अपनी पत्नी के साथ
वैसा ही व्यवहार करता है, अगर पिता अपनी पत्नी को सम्मान देगा तो पुत्र भी आगे चलकर अपनी पत्नी और हर स्त्री को सम्मान कि नज़र से देखेगा।


स्कूलों,शिक्षण संस्थाओं की भूमिका: स्कूल टाइम से ही बच्चों में अन्य दूसरे पाठ्यक्रमों के साथ-साथ नैतिक शिक्षा भी देनी चाहिए, पहले के समय में मानसिकता इतनी प्रोफेशनल नहीं हुआ करती थी, शिक्षक पढाई के साथ-साथ अपने कुछ ऐसे अनुभव या कहानियाँ बच्चों से साझा करते थे जिससे बच्चों को एक नैतिक सीख मिलती थी। आज स्कूल टाइम से ही बच्चों को ये शिक्षा दी जाती है कि तुम्हें आगे चलकर क्या जॉब करना है, किस जॉब में कितनी कमाई है आदि आदि...


बच्चों को भविष्य के लिए एक अच्छा, सामाजिक इंसान बनाने की शुरुवात स्कूल से ही हो जानी चाहिए। पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा भी शामिल होना चाहिए, अपने स्टार पर भी शिक्षक-शिक्षिकाओंको बच्चों को यौन शिक्षा देने से हिचकना नहीं चाहिए, आजकल अगर प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मिडिया अश्लील और अभद्र चीज़ें दिखा सकता है तो बच्चों को शिक्षक यौन शिक्षा क्यों नहीं दे सकते ..? इस बात से अभिवावक और शिक्षक जानकार भी अनजान बन जातें हैं कि बच्चा छुप-छुपकर टेलिविज़न और अखबारों में सेक्स से सम्बंधित ख़बरें पढता सुनता है, वो कहीं और से सेक्स के बारे में गलत बातें जाने इससे पहले अभिवावक और शिक्षक उनसे इन विषयों पर खुलकर बात करके उनकी जिज्ञासा शांत कर दें।


संगत : घर-परिवार के बाद टीन ऐज जनरेशन पर संगत का बहुत असर पड़ता है, बदलाव के इस समय में खुली मानसिकता जरुरी है, लेकिन उसका दुरुपयोग होना ठीक नहीं है, देर रात पार्टियां करना, एक दूसरे के कॉम्पटीशन में नशीली दवाएं लेना, ड्रिंक करना , ये सब
भटकाव के कारण हैं।


बच्चों को इससे रोकने के लिए अलग-अलग क्रिएटीविटी में खुद को व्यस्त रखना चाहिए, अभिवावकों को ज्यादा से ज्यादा समय अपने बच्चों को देना चाहिए, उनकी हर बात को ध्यान से सुनकर सही और गलत का फर्क समझाना चाहिए, एक ख़ास उम्र में आने पर बच्चों से मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए.


हादसा होने के बाद: अगर फिर भी रेप जैसी घटना किसी लड़की के साथ घट जाती है तो उसके लिए स्वयं या बेटी को शर्मिंदगी
का अहसास न कराए। बल्कि उसे अहसास कराएं कि जो कुछ उसके साथ हुआ उसमें उसका कोई दोष नहीं है। वह अकेली नहीं है पूरा परिवार उसके साथ है तथा वे सब मिलकर उस दुष्कर्मी को सजा दिलाने का प्रयत्न करेंगे। घर में सहज माहौल बनाये रखें, अब इसका क्या होगा.... इससे शादी कौन करेगा... हम समाज में क्या मुह दिखाएंगें जैसी हताशा वाली बातें न खुद करें न ही लड़की के सामने किसी और को करने दें।









लेखक





शोभा मिश्रा
संचालन

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