Wednesday, October 10, 2012

"गौरईया"

गौरैया

उसी शहतूत का पेड़ पर जिसके  आस-पास  पापुलर, मेहँदी, आम के पेड़ भी हैं !  एक धीमी आवाज़ सुनाई दे रही है कभी - कभी लेकिन वो नज़र नही आई ! 
कुछ साल पहले वो सुबह शाम आती  थी अपने झुण्ड के साथ ! खूब मधुर कलरव सुनाई देता था !   सुबह रसोई की व्यस्तता के साथ ही मैं चहकने लगती थी उनकी चहक सुनकर !   उनके लुकाछिपी के खेल में मैं भी शामिल हो जाती !  कभी वो सभी ऐसे शांत हो जातीं जैसे छिप गयीं  हों अपनी अलग अलग कोई शाख ढूंढकर !  फिर अचानक ही जोर से ऐसे  चहचहाने लगतीं मानो लुकाछिपी के खेल में किसी  शाख के पीछे से  अपनी सखी को ढूंढ  लिया हो और बाकी सारी सखियाँ फुदक-फुदककर खुश हो रहीं हों ! कभी वो एक साथ  धीमी आवाज़  में कुछ ऐसे बातें करतीं जैसे अपनी  दिनचर्या तय कर रहीं हों ! कुछ देर यूँ ही हरे - भरे शहतूत पर खेलकर  और शरारतें करके वो एक साथ कहीं उड़ जातीं !  उनके जाने के बाद शहतूत का पेड़ नौनिहालों  के खेलकर जाने के बाद बिखरे  आँगन - सा  खुश नज़र आता !
   अब अक्सर शहतूत के पेड़ पर उनमें से किसी की आवाज़ तो सुनाई देती है लेकिन वो  नज़र नहीं आती  !  आज फिर उसकी आवाज़ सुनाई दी !  गौर से देखने पर वो अपने एक साथी के साथ नज़र आई लेकिन बहुत  उदास  लग रही थी !  शाख-शाख पर घूमकर वो और उसका  साथी कुछ देर कुछ ढूंढते रहे ! ठूंठ हो चुकें पापुलर के पेड़ से एक गिलहरी भी उन्हें निहारती रही, कुछ कहती रही ! शहतूत के पेड़ के ऊपर के आसमान से  कुछ कौवे उड़ते हुए उन्हें निहारते रहे ! बुलबुल का एक जोड़ा भी चुपचाप उन्हें उत्साहपूर्वक देखता रहा ! कुछ देर बाद शहतूत के पेड़ पर फिर वही उदासी छा गई  ! वो अपने साथी के साथ उड़ गई !  गिलहरी,कौवे,बुलबुल भी कहीं चले गए .....
  हाँ .... आज सुबह एक गौरैया आई थी अपने साथी के साथ दूसरे साथियों को तलाशने,  उसी शहतूत के पेड़ पर जो मेरी खिड़की से नज़र आता  है ..........

(गौरैया के साथ कभी एक सुबह ) 
  (  मेरे घर की खिड़की से नज़र आता दृश्य ... जो कभी चहकता था ... आज उदास नज़र आता है )

शोभा
११/१०/२०१२ 

4 comments:

  1. बदलते परिवेश के नमी आँखों में रहती हैं ...बहुत बढ़िया

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.

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  3. बहुत भावपूर्ण रचना

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