Thursday, September 6, 2012

तुम्हारे खत




अचानक से हाथ लगे आज खत तुम्हारे
खुले तो मानो एक दुनिया खुल गयी मेरे सामने 
गुजरे वक्त के समंदर लांघ 
जाने कब पहुँच गयी बीते अ -तीत में
खत में तुम हो 
तुम्हारा गुस्सा है 
शिकायतें हैं
सबसे ज्यादा हैं विरह के नुक्ते और प्यार के हर्फ
खत रंगा है अलग अलग भाव से
सारे भाव पढ़ते मेरे होठों पर बस मुस्कुराहट है
आखिरी खत की तारीख देख
भीग गयीं पलकें
सुनो ..
एक खत फिर लिख के भेजो न !

शोभा
६/८/12

4 comments:

  1. खूबसूरत रचना

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  2. आता ही होगा एक और खत ...इस खत के जवाब में....
    बहुत सुन्दर!!

    अनु

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  3. सार्थक अभिव्यक्ति। मेरे नए पोस्ट 'समय सरगम' पर आपका इंतजार रहेगा।

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